Monday, December 17, 2007

Min bopæl - मेरा पता




Spørg daggryet og tusmørket, spørg by og land
de vil fortælle, hvor jeg hører til
jeg er ikke ubekendt, jeg er ikke navnløs
hvis nogen vil opsøge mig
bli’r det ikke svært
selv skyerne kender
hvert enkelt hus.


Hver enkelt side er pagineret
hver gyde og torv nummereret
verden er skrumpet ind i vinduer med hængelås
kun den lette brise i gardinet
åbner i splitsekund.
Spørg betonmure, vinduer og døre
de vil fortælle, hvor jeg hører til.


Jeg tror ikke folk snakker
så meget med hinanden.
Hjertets hemmeligheder
gemmes under øjenlåg på klem.


Livet er et mylder
det kommer og går.
Åh Gud ! Tristessen har gjort sit indtog.
Stop op, tal til en
nogen vil lytte
grib en hånd, en vil gå i knæ
hold hånden, spørg træet om hjørnet
det vil fortælle, hvor jeg hører til.


Der er stadigvæk en duft i luften af mit folk.
Jeg kender ikke destinationen,
men jeg er ifølge med en karavane.
Vegetationen gør stadigvæk min sjæl grøn.
Himlen veksler skiftevis mellem rød og gul,
årstiderne skifter med tiden,
med tålmodighed kommer det gode tilbage.


Giv håbet tid,
spørg den søde brise,
den vil fortælle, hvor jeg hører til. 
सुबह से शाम से पूछो,
नगर से गाम से पूछो
तुम्हें मेरा पता देंगे

कि इतना भी कहीं बेनाम अपना नाम तो नहीं
अगर कोई ढूँढना चाहे तो मुश्किल काम भी नहीं
कि अब तो बादलों को भी पता है नाम हर घर का
सफ़ों पर हर जगह टंकित हुआ है हर गली हल्का
कि अब दुनिया सिमट कर खिड़कियों में बंद साँकल सी
ज़रा पर्दा हिला और खुल गयी एक मंद आहट सी
सुगढ़ दीवार से पूछो
खिड़कियों द्वार से पूछो
तुम्हें मेरा पता देंगे


ये माना लोग आपस में ज़रा अब बोलते कम हैं
दिलों के राज़ भी आँखों में भर कर खोलते कम हैं
ज़िन्दगी़ भीड़ है हर ओर आती और जाती सी
खुदाया भीड़ में हर ओर छायी है उदासी सी
मगर तुम बात कर पाओ तो कोई तो रूकेगा ही
पकड़ कर हाथ बैठा लो तो घुटनों से झुकेगा ही
हाथ में हाथ ले पूछो
मोड़ के गाछ से पूछो
तुम्हें मेरा पता देंगे


फिज़ां में अब तलक अपनों की हल्की सी हवा तो है
नहीं मंज़िल पता पर साथ अपने कारवां तो है
वनस्पति में हरापन आज भी मन को हरा करता
कि नभ भी लाल पीला रूप दोनों वक्त है धरता
कि मौसम वक्त आने पर बदलते हैं समय से ही
ज़रा सा धैर्य हो मन में तो बनते हैं बिगड़ते भी
धैर्य धर आस से पूछो
मधुर वातास से पूछो
तुम्हें मेरा पता देंगे

2 comments:

पवन *चंदन* said...

मान से पूछा, सदा सम्‍मान से पूछा
काल से पूछा, अंतर जाल से पूछा
तुम्‍हारा नाम बतलाया, तुम्‍हारा काम बतलाया
तुम्‍हारे यश की गाथाएं, हमें सब लोग बतलाएं
जो धार सरिता में, वो भाव कविता में
जब तुम फूल बोओगी, सुगंधी क्‍यों न बिखरेगी
तराशोगी जो हिन्‍दी को, तो हिन्‍दी क्‍यों न निखरेगी
मैं प्रणाम करता हूं आपकी रचनाधर्मिता को
बड़ी सुंदर कविता है । बधाई ।

पूर्णिमा वर्मन said...

आपकी शुभेच्छा को मेरा सादर नमन!